
नई दिल्ली : डॉ. शंकर दयाल सिंह व्याख्यान माला के अंतर्गत ‘हमारी जरूरतें और चाहतें’ विषय पर भव्य कार्यक्रम का आयोजन एन.डी.एम.सी. कन्वेंशन सेंटर में किया गया। कार्यक्रम में देश के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति रही और सभागार पूरी तरह भरा रहा। जैसा कि विदित है डॉ. शंकर दयाल सिंह का नाम भारतीय राजनीति और साहित्य जगत में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उनका जन्म 27 दिसंबर 1937 को बिहार के औरंगाबाद ज़िले के भवानीपुर गाँव में एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ। उनके पिता स्वर्गीय कामता प्रसाद प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी एवं समाजसेवी थे, जिनसे उन्हें राष्ट्रसेवा और सामाजिक सरोकारों की प्रेरणा मिली।
डॉ. सिंह बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। वे एक प्रखर साहित्यकार, चिंतक, पत्रकार और सफल राजनेता के रूप में जाने जाते थे। उन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य के संवर्धन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी लेखनी में राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक यथार्थ और मानवीय मूल्यों का सशक्त चित्रण मिलता है। उन्होंने अपने साहित्य को राजनीति से अलग रखते हुए निष्पक्षता और दूरदर्शिता का परिचय दिया।
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राजनीतिक जीवन में डॉ. शंकर दयाल सिंह ने सक्रिय भूमिका निभाई और वे संसद के सदस्य (पूर्व सांसद) रहे। इसके अतिरिक्त उन्होंने बिहार विधान परिषद के सदस्य के रूप में भी कार्य किया। सार्वजनिक जीवन में उनकी पहचान एक ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ और राष्ट्रवादी नेता के रूप में रही, जिन्होंने सदैव जनहित को सर्वोपरि रखा।आपातकाल के दौर में उन्होंने निर्भीकता से अपने विचार व्यक्त किए और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के पक्षधर रहे। उनके लेखों और भाषणों में उस समय के सामाजिक-राजनीतिक परिवेश का सजीव और स्पष्ट चित्रण मिलता है।
डॉ. सिंह का संपूर्ण जीवन सादगी, नैतिकता और आदर्शों पर आधारित था। वे भारतीय संस्कृति, परंपरा और मूल्यों के प्रबल समर्थक थे। साहित्य और राजनीति—दोनों क्षेत्रों में उनका योगदान प्रेरणास्पद है।उनका व्यक्तित्व आज भी समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है और उनके विचार संतुलित, नैतिक एवं जागरूक जीवन जीने की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।कार्यक्रम का शुभारंभ गणेश वंदना से हुआ।
स्वागत उद्बोधन में डॉ. शंकर दयाल सिंह के सुपुत्र राजेश सिंह ने मुख्य अतिथि मनोज सिन्हा, मुख्य वक्ता स्वामी चिदानंद सरस्वती तथा अन्य विशिष्ट अतिथियों का स्वागत किया।मुख्य वक्ता स्वामी चिदानंद सरस्वती ने अपने संबोधन में भारतीय संस्कृति की मौलिकता पर प्रकाश डालते हुए जीवन में ‘जरूरत’ और ‘चाहत’ के अंतर को विभिन्न उदाहरणों, श्लोकों और अपने अंतरराष्ट्रीय अनुभवों के माध्यम से स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि संतुलित जीवन के लिए शांति और संतुष्टि अनिवार्य हैं तथा आधुनिक जीवन में इन मूल्यों को अपनाने की आवश्यकता है।मुख्य अतिथि मनोज सिन्हा ने डॉ. शंकर दयाल सिंह के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को याद करते हुए उन्हें संत-साहित्यकार और प्रखर राष्ट्रवादी नेता बताया। उन्होंने कहा कि डॉ. सिंह ने अपने लेखन में सत्य को निर्भीकता से प्रस्तुत किया, विशेषकर आपातकाल के संदर्भ में उनके विचार अत्यंत महत्वपूर्ण रहे हैं।सिन्हा ने अपने वक्तव्य में ‘हमारी जरूरतें और चाहतें’ विषय पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता, जबकि जागरूकता और संतुलन ही जीवन का आधार है। उन्होंने भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा, वैदिक संस्कृति और आधुनिक विकास के बीच समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही उन्होंने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश की प्रगति और 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की चर्चा की।कार्यक्रम में गिरिजा देवी सहित अनेक विशिष्ट अतिथि उपस्थित रहे।
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इसके अलावा पूर्व केंद्रीय मंत्री संजय सिंह, अखिलेश प्रताप सिंह, दिनेश सिंह, संतोष भारतीय, संजय पासवान, किरण चोपड़ा तथा प्रसार भारती के अध्यक्ष सहित कई गणमान्य लोग मौजूद रहे।कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन डॉ. रश्मि सिंह ने किया।
इस अवसर पर बिहार के औरंगाबाद जिले के भवानीपुर गांव से आए नागरिकों ने भी मुख्य अतिथि का स्वागत किया।यह व्याख्यान माला डॉ. शंकर दयाल सिंह के विचारों और मूल्यों को स्मरण करते हुए समाज को संतुलित एवं सार्थक जीवन की दिशा में प्रेरित करने का महत्वपूर्ण प्रयास साबित हुई।





